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इस किताब में कविताएँ हैं। इससे ज्यादा ख़ास इस किताब में कुछ नहीं। न तो इसमें इस काल का मानव इतिहास है और न ही कोई गूढ़ बौद्धिक रहस्य है। रात बे-रात कॉपी पर आड़ी तिरछी बनाई गईं रेखाएं भर हैं जिसे इसे लिखने वाले ने कविता होने का दावा किया है
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सबसे पहले आयी यात्रा, उस यात्रा ने पैदा किया एक यात्री, हमारा ईश्वर। और उस यात्री के प्रेमपत्र में जन्मी मानव सभ्यता। ईश्वर अनंत यात्री था इसलिए वो इतना दयालु ज़रूर था कि उसने मानव जीवन को छोटा रखा। मैंने उसी ईश्वर से डाह में अपनी कविताएँ छोटी रखीं । तुम्हें मालूम है क्या कि कविता पहाड़ों से घिरे किसी बादी में खिलता एक पुष्प है। हर यात्री उस तक अलग-अलग रास्ते से पहुँचता है और उसे देखकर वो मायूस भी हो सकता है, मुस्कुरा सकता है, ठहाके लगा सकता है। पर इन सब में पुष्प का कोई योगदान नहीं होता, वो तो बस वहाँ था। इन सब में सबसे अहम होती है यात्रा, कि कौन किस रास्ते वहाँ तक पहुँचा। एक दिन मेरी यात्राओं का ईश्वर मुझे मानव सभ्यता का पहला प्रेमपत्र देकर एक पते पर पहुँचाने को कहेगा। उस एक दरवाजे के आगे जहाँ दुनिया के सारे पहाड़ मिलते होंगे, मेरे पास फूलों का एक बोझा होगा। मैं दरवाजे पर आवाज़ लगाऊंगा और वो तुम्हारा घर निकलेगा।
Review
If you are a poetry lover, either reader or writer or both this book is a must read one for everyone. @Piya